क्या PM मोदी का ‘नशा-मुक्त युवा’ अभियान 2027 के चुनावों से पहले पंजाब में राजनीतिक समीकरण बदल देगा, या यह एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले लेगा?

Prime Minister Narendra Modi during the virtual launch of ‘Nasha Mukt Yuva for Viksit Bharat Sankalp Abhiyan Prime Minister Narendra Modi during the virtual launch of ‘Nasha Mukt Yuva for Viksit Bharat Sankalp Abhiyan
विकास भारत संकल्प अभियान के लिए नशा मुक्त युवा के वर्चुअल लॉन्च के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

नई दिल्ली/चंडीगढ़: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को देशभर में ‘नशा मुक्त युवा, विकसित भारत संकल्प अभियान’ की शुरुआत करते हुए युवाओं से नशामुक्त भारत के निर्माण का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब देश का युवा स्वस्थ, जागरूक और नशे जैसी बुराइयों से मुक्त होगा। प्रधानमंत्री ने इस अभियान को केवल सरकारी पहल नहीं बल्कि परिवार, समाज और पूरे देश की साझा जिम्मेदारी बताया।

हालांकि यह अभियान पूरे देश के लिए शुरू किया गया है, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से इसकी सबसे अधिक चर्चा पंजाब को लेकर हो रही है। राज्य में पिछले एक दशक से अधिक समय से नशे का मुद्दा लगातार चुनावी बहस का केंद्र रहा है। लगभग हर चुनाव में राजनीतिक दलों ने नशा खत्म करने का वादा किया, लेकिन समस्या आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी है। ऐसे में 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री मोदी की यह पहल कई नए राजनीतिक और सामाजिक सवाल खड़े कर रही है।

पीएम मोदी ने युवाओं को बताया विकसित भारत की सबसे बड़ी ताकत

अभियान की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है। यदि युवा नशे जैसी लत से दूर रहेंगे तो देश आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी रूप से तेजी से आगे बढ़ सकेगा।

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उन्होंने कहा कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल कानून के भरोसे नहीं जीती जा सकती। इसके लिए परिवारों की जागरूकता, समाज की भागीदारी, शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका और युवाओं के सहयोग की भी आवश्यकता है। प्रधानमंत्री ने सभी नागरिकों से इस अभियान को जन आंदोलन बनाने की अपील की।

उनका कहना था कि विकसित भारत का लक्ष्य तभी हासिल होगा, जब देश का प्रत्येक युवा अपनी ऊर्जा शिक्षा, कौशल, रोजगार और राष्ट्र निर्माण में लगाए।

पंजाब में क्यों अहम माना जा रहा है यह अभियान?

प्रधानमंत्री की इस पहल का सबसे अधिक राजनीतिक असर पंजाब में देखा जा रहा है। राज्य में नशे का मुद्दा लंबे समय से राजनीति का प्रमुख विषय रहा है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव से लेकर अब तक लगभग हर चुनाव में यह मुद्दा प्रमुखता से उठता रहा है।

2012 में शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन सरकार के दौरान विपक्ष ने राज्य में बढ़ते नशे के मामलों को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में भी नशे का मुद्दा लगातार चर्चा में रहा।

वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भी नशा खत्म करने का बड़ा वादा किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सत्ता में आने के बाद कम समय में नशे के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई का भरोसा दिया था। हालांकि विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा कि अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके।

इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने भी नशे के खिलाफ सख्त कार्रवाई का वादा किया और सत्ता में आने के बाद राज्य सरकार ने ‘युद्ध नशे विरुद्ध’ अभियान शुरू किया। सरकार ने हजारों मामलों में कार्रवाई, तस्करों की गिरफ्तारी और अवैध संपत्तियों पर कार्रवाई जैसे कदम उठाए। इसके बावजूद विपक्ष का दावा है कि नशे की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

बीजेपी को मिल सकता है नया राजनीतिक मुद्दा

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी का यह अभियान सामाजिक पहल होने के साथ-साथ राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

भाजपा लंबे समय से पंजाब में अपने संगठन को मजबूत करने का प्रयास कर रही है। ऐसे में यदि पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में स्वतंत्र रूप से या प्रमुख भूमिका के साथ मैदान में उतरती है तो नशे के मुद्दे को प्रमुख चुनावी एजेंडा बना सकती है।

हाल ही में भाजपा में शामिल हुए राज्यसभा सांसद विक्रमजीत सिंह साहनी ने भी पंजाब में बड़े स्तर पर नशामुक्ति अभियान चलाने और लाखों युवाओं को इससे जोड़ने की बात कही है। इससे संकेत मिलते हैं कि पार्टी इस सामाजिक अभियान को जनसंपर्क और जागरूकता कार्यक्रम के रूप में भी आगे बढ़ा सकती है।

हालांकि भाजपा ने अभी तक पंजाब में पूर्ण बहुमत वाली सरकार का नेतृत्व नहीं किया है। ऐसे में पार्टी यह तर्क भी दे सकती है कि उसे राज्य में अपनी नीतियों को लागू करने का पूरा अवसर अभी नहीं मिला।

सिर्फ पुलिस कार्रवाई से खत्म नहीं होगी समस्या

विशेषज्ञों का मानना है कि नशे की समस्या केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है। इसके पीछे बेरोजगारी, मानसिक तनाव, सामाजिक परिस्थितियां, नशे की लत और पुनर्वास जैसी कई चुनौतियां जुड़ी हुई हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि नशे के खिलाफ अभियान में पुलिस कार्रवाई के साथ-साथ नशा मुक्ति केंद्रों की मजबूती, युवाओं को रोजगार के अवसर, खेल गतिविधियों को बढ़ावा और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार भी जरूरी है।

सामाजिक संगठनों का भी कहना है कि यदि परिवार और स्थानीय समुदाय सक्रिय भूमिका निभाएं तो युवाओं को नशे से दूर रखने में बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।

2027 चुनाव से पहले बढ़ेगी राजनीतिक बहस

पंजाब विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन राज्य में राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। ऐसे में नशे का मुद्दा एक बार फिर चुनावी बहस के केंद्र में आने की संभावना है।

सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी अपनी सरकार द्वारा की गई कार्रवाई और अभियानों को उपलब्धि के रूप में पेश कर सकती है। वहीं कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल भी राज्य में नशे की स्थिति को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश करेंगे।

भाजपा इस बीच प्रधानमंत्री मोदी के राष्ट्रीय अभियान को राज्य तक पहुंचाने का प्रयास कर सकती है और इसे युवाओं तथा समाज को जोड़ने वाली पहल के रूप में प्रस्तुत कर सकती है।

हालांकि यह भी स्पष्ट है कि केवल चुनावी वादों से नशे जैसी गंभीर समस्या का समाधान संभव नहीं है। पंजाब के लोगों की अपेक्षा है कि कोई भी सरकार सत्ता में आए, वह इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए प्रभावी और दीर्घकालिक नीति अपनाए।

क्या बदलेगी पंजाब की तस्वीर?

प्रधानमंत्री मोदी का ‘नशा मुक्त युवा, विकसित भारत संकल्प अभियान’ पूरे देश में युवाओं को जागरूक करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। पंजाब जैसे राज्य, जहां नशे का मुद्दा लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चिंता का विषय रहा है, वहां इस अभियान पर विशेष नजर रहेगी।

आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि यह पहल केवल जनजागरूकता अभियान तक सीमित रहती है या फिर राज्यों, सामाजिक संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से व्यापक जन आंदोलन का रूप लेती है। वहीं 2027 के विधानसभा चुनाव के करीब पहुंचते-पहुंचते यह मुद्दा राजनीतिक दलों की रणनीति और चुनावी विमर्श का भी अहम हिस्सा बन सकता है।

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